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जिले में “आर्कियोलॉजिकल एंड कल्चरल कॉन्टेक्स्ट ऑफ सरगुजा” पर पांच दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला संपन्न आर्कियोलॉजिकल एंड कल्चरल कॉन्टेक्स्ट ऑफ

जिले में "आर्कियोलॉजिकल एंड कल्चरल कॉन्टेक्स्ट ऑफ सरगुजा" पर पांच दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला संपन्न आर्कियोलॉजिकल एंड कल्चरल कॉन्टेक्स्ट ऑफ

जिले में “आर्कियोलॉजिकल एंड कल्चरल कॉन्टेक्स्ट ऑफ सरगुजा” पर पांच दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला संपन्न

आर्कियोलॉजिकल एंड कल्चरल कॉन्टेक्स्ट ऑफ सरगुजा” कार्यक्रम में पुरातत्व विभाग द्वारा पंजीकृत 90 छात्र-छात्राएं सम्मिलित हुए

एमसीबी से कैलाश गिरी की रिपोर्ट

एमसीबी/21 फरवरी 2026/ संचालनालय पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय, रायपुर द्वारा 17 से 21 फरवरी तक “आर्कियोलॉजिकल एंड कल्चरल कॉन्टेक्स्ट ऑफ सरगुजा” विषय पर पांच दिवसीय राज्य स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस महत्वपूर्ण कार्यशाला का उद्देश्य सरगुजा अंचल की समृद्ध पुरातात्विक विरासत, ऐतिहासिक स्मारकों, महापाषाणीय संस्कृति, जनजातीय परंपराओं तथा अभिलेखन एवं संवर्धन के प्रति व्यापक जागरूकता उत्पन्न करना और प्रतिभागियों का क्षमता विकास करना था। राज्यभर से आए प्रतिभागियों के बीच यह आयोजन शोध, संरक्षण और सांस्कृतिक संवाद का सशक्त मंच बना।

कार्यशाला में मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के पुरातत्व एवं पर्यटन विभाग के नोडल अधिकारी तथा जिला पुरातत्व संघ के सदस्य डॉ. विनोद कुमार पांडेय को विषय विशेषज्ञ के रूप में आमंत्रित किया गया। डॉ. पांडेय ने “मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले के पुरास्थल एवं उनका संरक्षण” विषय पर विस्तृत एवं शोधपरक व्याख्यान प्रस्तुत किया, जिसमें उन्होंने जिले की ऐतिहासिक धरोहरों, उनके महत्व और संरक्षण की चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला।

अपने व्याख्यान में डॉ. पांडेय ने सीतामढ़ी हरचौका (रामवन गमन पथ) का विशेष उल्लेख करते हुए इसे धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल बताया तथा इसके संरक्षण और पर्यटन संभावनाओं पर विस्तार से चर्चा की। जटाशंकरी गुफा की प्राकृतिक संरचना और धार्मिक महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने इसे क्षेत्र की विशिष्ट पहचान बताया। गोंडवाना मरीन फॉसिल पार्क का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यहां प्राप्त प्रागैतिहासिक समुद्री जीवाश्म इस क्षेत्र के भू-वैज्ञानिक इतिहास को दर्शाते हैं और वैज्ञानिक दृष्टि से यह स्थल अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इसके अतिरिक्त उन्होंने सीतामढ़ी घघरा, घघरा का शिव मंदिर, रॉक पेंटिंग, सती मंदिर चिरमिरी तथा धवलपुर की गढ़ी जैसे महत्वपूर्ण स्थलों के ऐतिहासिक महत्व और संरक्षण की आवश्यकता पर गंभीरतापूर्वक चर्चा की। उन्होंने जिला प्रशासन द्वारा किए जा रहे संरक्षण प्रयासों की जानकारी साझा करते हुए कोरिया एवं चांगभखार रियासत के ऐतिहासिक योगदान को भी रेखांकित किया और कहा कि इन रियासतों की सांस्कृतिक विरासत आज भी क्षेत्र की पहचान का अभिन्न हिस्सा है।

डॉ. पांडेय विगत 25 वर्षों से एमसीबी जिले में पर्यटन और पुरातत्व के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उनके शोध पत्र राष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो चुके हैं और उन्हें विभिन्न प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। वर्तमान में वे जिले के पुरातत्व एवं पर्यटन विभाग के नोडल अधिकारी होने के साथ-साथ शासकीय हाई स्कूल पिपरिया में व्याख्याता के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

कार्यशाला में डॉ. सचिन मंदिलवार (प्राध्यापक, बोधगया विश्वविद्यालय), डॉ. अजय पाल सिंह, डॉ. विनय तिवारी, अजय कुमार चतुर्वेदी, वाल्मीकि दुबे, डॉ. भाग्यश्री दीवान, प्रभात कुमार सिंह (पुरातत्वविद), प्रवीण तिर्की तथा अमर भारद्वाज सहित पुरातत्व विभाग द्वारा पंजीकृत 90 छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। पांच दिनों तक चले इस आयोजन में व्याख्यान, विचार-विमर्श और शोध आधारित प्रस्तुतियों के माध्यम से सरगुजा की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों को संरक्षित करने का सशक्त संदेश दिया गया।

अपने उद्बोधन में डॉ. विनोद कुमार पांडेय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पुरातत्व और संस्कृति किसी भी राष्ट्र की सुदृढ़ नींव होती है। इनके संरक्षण से ही आने वाली पीढ़ियां अपने इतिहास और पहचान से जुड़ी रह सकती हैं। उनका यह संदेश कार्यशाला का मूल भाव बनकर उभरा और उपस्थित प्रतिभागियों को सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण हेतु प्रेरित करता रहा।

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