दामजीपुराबैतूलभीमपुर

दामजीपुरा में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर उमड़ा जनसैलाब

उलगुलान के नायक को किया नमन

दामजीपुरा में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर उमड़ा जनसैलाब

उलगुलान के नायक को किया नमन

दामजीपुरा:बैतूल जिले के भीमपुर विकासखंड अंतर्गत ग्राम दामजीपुरा का फाइव स्टार चौक (Five Star Chowk) शनिवार,15 नवंबर 2025 को एक ऐतिहासिक पर्व का साक्षी बना। धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की 150 वीं जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में बड़े ही उत्साह श्रद्धा और पारंपरिक धूमधाम के साथ मनाया गया। यह अवसर न केवल एक महान स्वतंत्रता सेनानी को श्रद्धांजलि देने का था, बल्कि आदिवासी समाज की एकता सांस्कृतिक समृद्धि और जीवंत विरासत का भी अद्भुत प्रदर्शन था। शुरुआत:पारंपरिक गीतों और नृत्य से गूंज उठा दामजीपुरा कार्यक्रम की शुरुआत अत्यंत मनमोहक और पारंपरिक तरीके से हुई।आसपास के गांवों से पधारे हजारों ग्रामीणों, महिलाओं और युवाओं ने ढोल-मांदल की थाप पर पारंपरिक आदिवासी नृत्य और लोकगीतों की प्रस्तुति दी, जिससे पूरे क्षेत्र में एक उत्सव जैसा माहौल छा गया। कार्यक्रम के मुख्य मंच पर भगवान बिरसा मुंडा के छायाचित्र को श्रद्धापूर्वक स्थापित किया गया। उपस्थित जनसमुदाय ने सामूहिक रूप से उनके चित्र पर माल्यार्पण कर उन्हें नमन किया। इस दौरान लोगों ने अपनी आस्था और सम्मान प्रकट करते हुए भगवान बिरसा मुंडा की जय-जयकार के नारे लगाए,जिनकी गूंज काफी दूर तक सुनाई दी। वक्ताओं ने याद किया ‘उलगुलान’ का संघर्ष कार्यक्रम के वक्ताओं ने भगवान बिरसा मुंडा के जीवन और उनके ‘उलगुलान’ (महान हलचल) आंदोलन पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि 19वीं सदी के अंत में जब ब्रिटिश हुकूमत और स्थानीय जमींदारों के शोषण ने आदिवासी समाज का जीवन दूभर कर दिया था, तब बिरसा मुंडा ने मात्र 25 वर्ष की अल्पायु में ही उनके विरुद्ध अदम्य साहस और क्रांतिकारी नेतृत्व का परिचय दिया। वक्ताओं ने कहा,बिरसा मुंडा का जीवन सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है,बल्कि यह जल, जंगल और जमीन के अधिकारों के लिए एक पूरे समाज के संघर्ष की गाथा है। उनका बलिदान हमें यह सिखाता है कि अन्याय के सामने झुकना नहीं चाहिए। उनके विचार और संघर्ष आज भी हमारे समाज को प्रेरणा देते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वाभिमान और पहचान का आधार बने रहेंगे।”

सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां स्थानीय महिलाओं और युवाओं ने भी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। उनकी उत्साहवर्धक प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम के माहौल को और भी अधिक खुशनुमा और गरिमामय बना दिया। इन प्रस्तुतियों में आदिवासी संस्कृति के गहरे मूल्यों और सामुदायिक भावना का सजीव चित्रण किया गया। यह देखकर स्पष्ट था कि बिरसा मुंडा की विरासत आज भी इस समुदाय के हृदय और संस्कृति में पूरी तरह से जीवित है।

विशिष्ट जनों की उपस्थिति

इस गौरवशाली अवसर पर क्षेत्र के कई गणमान्य व्यक्ति और सामाजिक कार्यकर्ता उपस्थित रहे। बड़ी संख्या में ग्रामीणों की उपस्थिति ने यह सिद्ध कर दिया कि भगवान बिरसा मुंडा आज भी जन-जन के हृदय में पूजनीय हैं।

इस अवसर पर रितेश चौहान,साबुलाल जामुंकार, शंकरलाल उईके,रामा काकोडिया, यशवंत सलामे,भीमसिंह कुमरे,डी.एन.उइके,पंकज कवड़े, मनोहरीलाल मर्सकोले, मदनलाल परते, रोहित उईके,सेम चौहान,श्यामलाल मर्सकोले, दलपत इवने सहित क्षेत्र के अनेक समाजसेवी और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित हुए।

समापन और भविष्य की प्रेरणा

कार्यक्रम का समापन सामूहिक रूप से भगवान बिरसा मुंडा की जय-जयकार और उनकी विरासत को आगे बढ़ाने के संकल्प के साथ हुआ। पूरे आयोजन के दौरान दिखाई गई एकता, उत्साह और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रदर्शन यह दर्शाता है कि बिरसा मुंडा का संघर्ष आज भी समाज को एकजुट कर रहा है। इस 150 वीं जयंती समारोह ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि देश की आजादी और जनजातीय समाज के उत्थान में भगवान बिरसा मुंडा का योगदान अविस्मरणीय है, और उनकी स्मृति में मनाया जाने वाला जनजातीय गौरव दिवस देश के हर नागरिक के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

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