हरदा

आदिवासी परंपरानुसार ग्राम मालेगांव में दीपावली पर्व धूमधाम से मनाया गया

आदिवासी परंपरानुसार ग्राम मालेगांव में दीपावली पर्व धूमधाम से मनाया गया

आदिवासी परंपरानुसार ग्राम मालेगांव में दीपावली पर्व धूमधाम से मनाया गया

हरदा से ब्यूरो चीफ गोपाल शुक्ला

टिमरनी- वनांचल क्षेत्र के ग्राम मालेगांव में आदिवासी परंपरानुसार दीपावली पर्व मनाया गया जहां भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा प्रदेश उपाध्यक्ष एवं टिमरनी के पूर्व विधायक संजय शाह सम्मिलित हुए और ग्रामवासियों को दीपावली की शुभकामनाएं प्रेषित कर सकते हुए डंडार नृत्य पर थिरके भी।

वनांचल क्षेत्र में दीपावली पर्व एक दिन नहीं बल्कि पूरे एक महीने तक अलग अलग गांव में मनाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। किस गांव में दीपावली कब मनाई जायेगी, इसका निर्णय ग्राम के भोमका (मुखिया) एवं ग्राम पटेल द्वारा तय किया जाता है। उसी के अनुसार ग्रामीण दीपावली और गोठान का आयोजन करते हैं।इसी परंपरा के तहत टिमरनी विकासखंड के आदिवासी बाहुल्य गांव मालेगांव में दीपावली का पर्व बड़े ही हर्षोल्लास से मनाया गया।जबकि मंगलवार को गोठान मेले का आयोजन किया गया। मेले में सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण अपने परिवार सहित पहुंचे। कई दुकानें सजी जिनमें खिलौनें खान-पान की वस्तुओं से लेकर घर की सजावटी सामग्री एवं सब्जी भाजी की बिक्री हुई। आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में बच्चे और महिलाएं भी मेले में शामिल हुए। इस अवसर पर आदिवासी संस्कृति अनुसार पारंपरिक वाद्य यंत्र ढोलक, टिमकी एवं बांसुरी बजाकर सामूहिक डंडार नृत्य किया गया। दीपावली के शुभ अवसर पर ग्राम पंचायत मालेगांव सरपंच श्रीमति फूलवती बाई इवने द्वारा सभी ग्राम वासियों को शुभकामनाऐं दी गई। भाजपा मंडल अध्यक्ष सतीश इवने ने बताया कि वनांचल क्षेत्र में अलग तरीके से दीपावली पर्व मनाया जाता है। दीपावली पर्व की तैयारी महीने भर पहले से की जाती है, जिसमें महिलाओं द्वारा घरों की साफ सफाई रंग रोगन एवं दीवार पर पारंपरिक चित्रों को उकेरा जाता है।ज्ञात हो कि वनांचल में दीपावली पर्व एक माह तक मनाया जाता है। ग्राम पटेल केवलराम आहके ने कहा रात में जगोरा (रतजगा) किया जाता है।उत्सव की शुरूआत मुठवा बाबा की पूजा अर्चन कर पूरे गांव में गोदोनी निकाली जाती है जिसमें गायकी ठाठ्या समाज द्वारा चावरा साथ लेकर चलते हैं जो सात प्रकार के पेड़ के पत्ते का बना हुआ रहता है।महिलाओं द्वारा आरती की जाती और भिच्छा के रूप में अनाज ठाट्या लोगों को देते हैं साथ ही लोग परम्पारिक वेषभूषा और ढोलक बांसुरी बजाकर नृत्य करते हैं महिलाएं परम्पारिक गीत गाती है। प्रेम आहके ने बताया रात्रि में दीप जलाकर रोशनी की जाती है। युवाओं द्वारा फटाके फोड़े जाते हैं और आतिशबाजी भी की जाती है। पायगा में मिट्टी की बनीं हुई कुलिया में पानी रखते हैं।जिससे गौमाता का मुंह धोते हैं, उसके बाद बैलों को कुछ लोग शाम को खिचड़ी खिलाते हैं, कुछ लोग सुबह खिलाते हैं। खिचड़ी सात प्रकार के नये अनाज मक्का, धान, ज्वार, घटेलू चौंला, उरद एवं मूंगफली आदि से बनती है, जिसे गौमाता को खिलाने का महत्व है। सुबह गौमाता एवं बैलों को विशेष रूप से सजाया जाता है। जिसमें मुख्य रूप से गेरू हिरंगची एवं रंग-बिरंगे पेंट से गाय बैलों के सींग को रंगते पैर में झूल पहनाते हैं।उनके गले में घुंघरू की फूलमाला बांधी जाती है, बैलों के गले में मोरपंख बांधकर कर सजाया जाता है। उसके बाद पारंपरिक नृत्य के साथ पूरे गांव के गौमाता एवं बैलों को हनुमान मंदिर तक ले जाकर अभिषेक किया जाता है। युवाओं द्वारा बैल जोड़ी का उत्कर्ष श्रृंगार कर दौड़ाया भी जाता है उसके बाद सामाजिक लोग अपने परम्परागत वेशभूषा में तय स्थान (गोठान) पर उत्सव मनानें एकत्रित होते हैं। भौमका श्री शिवप्रसाद ने बताया यह परम्परा आदिकाल से चली आ रही है।दीपावली का पर्व समृद्धि के साथ जनजाति के अस्तित्व का भी प्रतीक माना जाता है। पशुओं को चराने वाले(ठाठ्या) लोग दीपावली पर्व पर मुख्य आकर्षण का केंद्र होते हैं। इस दिन सभी ग्रामवासियों द्वारा ठाठ्या को मिठाई कपड़े एवं नगद राशि देने की भी प्रथा है। मेले में स्थानीय युवाओं ने पारंपरिक ढंडार नृत्य प्रस्तुत किया ।जो कि आदिवासी समाज की पहचान माना जाता है। इस दौरान बांसुरी और ढोलक की थाप पर युवाओं ने सामूहिक नृत्य कर वातावरण को उत्सवमय बना दिया। गायकी समाज के कलाकारों ने हाथ में बांसुरी, गले में कौड़ी की माला और पैर में घुंघरू पहनकर मधुर धुनों पर गायकी नृत्य प्रस्तुत किया, जिसे देखने आसपास के गांवों से लोगों ने पहुंचकर दीपावली पर्व का भरपूर आनंद लिया।

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